जब मै कालेज में था तब डायरी लिखा करता था...
कुछ जो दिल को छु जाता था उसे नोट कर लिया करता था
There are two ways to live your life one is as though nothing is a miracle.
The other is as though everything is a miracle.
सामने है जो उसे लोग बुरा कहते हैं
जिसको देखा ही नहीं उसको खुद कहते हैं
जिंदगी तुझसे हर एक सांस पर समझौता करूं शौक जीने का है मुझको मगर इतना तो नहीं
खामोशी की मौत गवारा नहीं मुझको
शीशा हूं टूट कर भी खाना छोड़ जाऊंगा
हजूमे गम मेरी फितरत बदल नहीं सकते
क्या करूं मुझे आदत है मुस्कुराने की
मिली हवाओं में उड़ने की वह सजा यारो
कि मैं जमीन के रिश्तो से कट गया यारों
कभी-कभी यूँ भी हमने अपने जी को बहलाया है
जिन बातों को खुद ना समझे औरों को समझाया है
हमको मालूम है जन्नत की हकीकत लेकिन दिल को खुश रखने को ग़ालिब ख्याल अच्छा है
दिल दे तो इस मिजाज का परवरदिगार दे
जो गम की घड़ी को भी खुशी में गुजरते
न था कुछ तो खुदा था, कुछ न होता तो खुदा होता
डुबोया मुझको होने ने, ना होता मैं तो क्या होता
जिंदगी क्या है खुद ही समझ जाओगे
कि बारिशों में पतंग उड़ाया करो
अपने गम को किसी और को दिखाया न जाए घर पर ही बिखरी हुई चीजों को सजाया जाए
धूप में निकलो घटाओं में नहा कर देखो
जिंदगी क्या है किताबों को हटाकर देखो
दिल भी जिद पे अदा है किसी बच्चे की तरह या तो सब कुछ ही चाहिए या कुछ भी नहीं
जब भी किसी से कोई गिला रखना
सामने अपने आईना रखना
ऐ खुदा रेत के सेहारा को समंदर करते
या छलकती हुई आंखों को भी पत्थर कर दे
चांद के साथ कई दर्द पुराने निकले
कितने गम थे जो तेरे गम के बहाने निकले
क़हकहा आंखों का बर्ताव बदल देता है
हंसने वाले तुझे आंसू नजर आए कैसे
सच घटे या बड़े तो सच ना रहे
झूठ की तो कोई इंतहा ही नहीं
किन राहों से दूर है मंजिल कौन सा रास्ता है आसान
हम जब थक कर रुक जाएंगे औरों को समझाएंगे
खुदा हमको ऐसी खुदाई न दे
कि अपने सिवा कुछ दिखाई न दे
हर तरफ हर जगह बेशुमार आदमी
फिर भी तन्हाइयों का शिकार आदमी
औरों को हंसते देखो मनु
हँसो और सुख पाओ
अपने सुख को विस्तृत कर लो
सबको सुखी बनाओ
उन्हें यह ज़िद कि मुझे देख कर किसी को ना देख
मेरा यह शौंक की सबसे कलम करता चलूँ
वह मेरे सामने गया और मैं
रास्ते की तरह देखता रह गया
मेरा कातिल ही मेरा मुंसिफ है
क्या मेरे हक में फैसला देगा
आखरी हिचकी तेरी बाहों में आए
मौत भी मैं शायराना चाहता हूं
कारगर मेरी दुआ हो यह जरूरी तो नहीं,
मैं जो मांगू वह आता हो यह जरूरी तो नहीं. शेख करता तो है मस्जिद में खुद को सजदे, उसके दिल में भी खुदा हो यह जरूरी तो नहीं. खामोशी भी तो बाअंदाजे गिला होती है, शिकवा होठों से अदा हो यह जरूरी तो नहीं. इश्क ने साज ए मोहब्बत पर गजल छेड़ी है
हुस्न भी नगमा ए सरा हो यह जरूरी तो नहीं. तीराबख्ती में भी जीने का मजा है मंजर,
ऐश ही जुज्बे बका हो यह जरूरी तो नहीं.
तीराबख्ती- तकलीफ
जुज्बे बका- चिरस्थायी
नगमा ए सरा- संपूर्ण गीत
I do not love you,
for
What you are
But for
What I am with you...
दो और दो का जोड़ हमेशा चार कहां होता है सोच समझ वालों को थोड़ी नादानी दे मौला
मेरी आवाज ही पर्दा है मेरे चेहरे का
मैं हूं ख़ामोश जहां मुझको वहां से सुनिए
कोई हाथ भी ना मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से
यह नए मिज़ाज का शहर है जरा मिला करो फासले से
कोई देता है दिल को मुसलसल आवाज;
और फिर अपनी ही आवाज से घबराता है.
अपने बदले हुए अंदाज का एहसास नहीं;
मेरे बहके हुए अंदाज से घबराता है.
राज को है किसी हमराज की मुद्दत से तलाश; और दिल है कि सोहबते हमराज से घबराता है. शौक यह की उड़े वह तो जमीन साथ उड़े; हौसला यह की परवाज से घबराता है.
तेरी तकदीर में आसाइश ए अंजाम नहीं;
कि तू शोरिश ए आगाज़ से घबराता है.
ना मैं तलाश करूं
तुम में
जो नहीं हो तुम
ना तुम तलाश करो मुझ में
जो नहीं हूं मैं
यह बात उन दिनों की है
जब इस ज़मी पर
इबादत घरों की जरूरत नहीं थी
मुझी में
खुद था...!
और तो सब कुछ ठीक है
लेकिन कभी कभी यूँ ही
चलता फिरता शहर, अचानक
तन्हा लगता है...
फासला
चांद बना देता है
हर पत्थर को
शहर में सबको कहां मिलती है रोने की जगह अपनी इज्जत भी यहां हँसने हँसाने से रही
मोहब्बत में नहीं है फ़र्क जीने और मरने का
उसी को देखकर जीते हैं जिस काफिर पे दम निकले
हर आदमी में होते हैं दस बीस आदमी
जिसको भी देखना हो कई कई बार देखना
एक पल में हम वहां से उठे
जहां बैठने में हमें जमाने लगे
अच्छा है दिल के पासवाने रहे अक्ल
पर कभी-कभी इस तनहा भी छोड़िए