Sunday, February 22, 2026

जो कौम इतिहास से नहीं सीखती

जब स्कूल में था तो इतिहास पढ़ते हुए अक्सर सोचता था कि, आखिर यह पढ़ाया क्यों जाता है ?
पाकिस्तान के खोखले Intaluctual हालात देख कर महसूस होता है कि वाकई इतिहास पढना जरूरी है और उससे भी ज्यादा जरूरी है सही इतिहास पढना.
बेचारे न मोहन-जोदाड़ो को हज़म कर पाते है ना ही भगत सिंह को. आखिर भगत को स्वीकारा तो उनकी धर्म की आलोचना को कैसे स्वीकारेंगे ? कैसे सुन पाएंगे उनके नास्तिकता के विचारों को. सिन्ध के राजा दाहिर, महाराजा रंजीत सिंह, तक्षशिला का महान विश्वविद्यालय इत्यादि इत्यादि... लिस्ट बहुत लंबी है.
गर्व करने लायक इतिहास है उस ज़मीन का, मगर एक पर्दा डाल दिया धर्म का. खत्म सब खत्म बस कलमे पर बना पाकिस्तान और इनकी ज़ज्बे वाली कौम.
" इसी ज़ज्बे ने इन्हे इतिहास से काट दिया, सिर्फ ज़ज्बात दे दिये."
जिन अफगानियों से पिट रहे है उन्ही के नाम पर इनकी मिसाइले है. अजीब चू... कौम है.
भूल गए उस महान रंजीत सिंह, हरि सिंह नलवा को जिन्होंने अफ़ग़ान आक्रमणों की परंपरा को रोका और पंजाब को स्थिरता दी.

हमें भी आँखों पर पर्दा डलने से बचना है, सही इतिहास ही पढ़ना और जानना है. अगर हमारा इतिहास सिर्फ हमारे अहम को फुला के गुब्बारा बना रहा है तो समझिए कहीं गड़बड़ है. इतिहास गलतियों का भी है. क्या हमें भी पड़ोसी की तरह एक फूला हुआ गुब्बारा ही बनना है.
हमें चार्वाक की नास्तिकता भी पढ़नी है, अष्टावक्र और कृष्ण की गीता भी. बुद्ध भी जानने है गुरु साहिबान भी.
इस्लाम से भी परिचित होना है इसाइयों से भी.
यहूदियों को भी जानना है, चीन की कन्फ़्यूशियस और परंपरा से भी परिचित होना है. अशोक भी पढना है औरंगजेब भी. आजाद कैसे हुए सिर्फ यही नहीं जानना यह भी जानना है कि आखिर गुलाम हुए क्यों ?
खुला रखना है अपने दिमाग की खिड़कियों को विचारों के लिए, वरना पड़ोसी जैसी सडांध आती शुरू हो जाएगी. कूप मंडूक नहीं बनना.

एक आटोमन साम्राज्य (आज का तुर्की) हुआ है जिसकी नींव अर्तुगुल गाजी ने रखी थी 1453 में  Mehmed II ने Constantine XI को हरा कर कोंटिस्टाइन नगर पर कब्जा किया था जिसे आज का Istambul भी कहते है.
जीतने के बाद Mehmed II से मिलने सोने के सिक्कों का तोहफा लेकर लूकस नोटरस आया जो कोन्टिस्टाइन की सैना का जनरल था और गद्दार था.
Mehmed II ने इन्हे देख कहा कि इनकी जरूरत तुम्हारे सम्राट और जनता को ज्यादा थी.
और आदेश दिया 
"सर कलम कर दो इसका"
ऐसे ही काफी उदाहरण भारतीय इतिहास में भी मौजूद है. हिन्दू और मुस्लिम शासकों दोनों में.
यह आपकी नज़र है और खासकर आपका नज़रिया है जो आपको सही तस्वीर दिखाता है.
"तो दोस्तों नज़र साफ और नजरिया दुरुस्त रखिए" फिर इतिहास जानिए...

वरना पड़ोसी के जैसे ही बौद्धिक कंगले (intellectually bank corrupt) हो जाओगे..
 



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