Wednesday, March 11, 2026

ISHWAR

hello everyone...

jab ham paida hue sab se pehley hamrey kaan mai jo shaabd aye woo they "bhagwa/allah/god " ham tabhee se condition hote chale gaye,BHAGWAN ke es concept se.

KYA Bhagwan/God/Allah exist kartey hai yaan sirf concept hee exist kartey hai....

KYA ham sab ek pre-programed system ke tareh he es concept follow karet hai.....

This quest took me to Bhagat Singh "y i'm an athist" a very logical/rational monograph....by a young man at the age of 22

at the same time Osho deals this issue at the ground of philosophy.

everyone here welcome ro contribute views....

This articale is written by famous urdu poet NIDA FAZALI

इंसानों की दुनिया में इंसानों ने ईश्वर को खोज निकाला. इसलिए कि उसे एक तराजू की तरह इस्तेमाल किया जा सके.
उसके माध्यम से अच्छाई-बुराई को तोला जा सके और यह बताया जा सके कि समाज में कौन सच के रास्ते पर चल रहा है और कौन झूठ के रास्ते में बदल रहा है.
ईश्वर की खोज जंगल को बस्ती बनाने के लिए ज़रूरी थी, लेकिन समय के साथ इस एक ईश्वर को कई हिस्सों में बाँट दिया गया...ईश्वर के इस बँटवारे ने सारी धरती को कई-कई टुकड़ों में बाँट दिया.
और फिर वही वरदान जो इंसान को इंसान बनाने के लिए आकाश से ज़मीन पर उतारा गया था...अलग-अलग दुकानों में सजाकर तिजारत बना दिया गया.
तिजारत
इस तिजारत ने वह मुसीबत फैलाई कि हज़ारों समाज फिर से बस्ती से निकलकर जंगल की ओर जाने लगे.
भारत का विभाजन इसी ईश्वर के ग़लत इस्तेमाल का नतीजा था. जो आज़ादी से अब तक एक नासूर की तरह रिस रहा है और न जाने कब तक यूँ ही रिसता रहेगा.
पहले एक ईश्वर को कई नामों से पुकारा जाता था. कोई उसे ख़ुदा के नाम से जानता था, तो कोई उसे गॉड के नाम से पहचानता था.
लेकिन हर धर्म में उसके नाम भले ही अलग-अलग हों, वह हर रूप में भेदभाव की सीमाओं से दूर था.
हिंदू धर्म में वह कण-कण में व्याप्त था, इस्लाम में वह तमाम आलमों का रखवाला था, बाइबल में जब प्रकाश को जागृत होने का आदेश दिया गया था तो वह रोशनी सारे संसार के लिए थी.
नानक ने एक ही नूर से सारे जग के उपजने की सीख दी थी और कबीर दास ने उस तक पहुँचने के लिए ढ़ाई अक्षर प्रेम की सलाह दी थी.
मुसीबत
मगर इन सारे पावन ग्रंथों और महान आत्माओं की नसीहत पर तिजारत हावी होती गई और दुनिया जीने वालों के लिए मुसीबत होती गई.
इस मुसीबत को किस्से कहानियों और कविताओं के रूप में वर्षों से शब्दबद्ध किया जा रहा है, मगर फिर भी यह मुसीबत कम होने का नाम नहीं ले रही
नानक ने एक ही नूर से सारे जग के उपजने की सीख दी थी और कबीर दास ने उस तक पहुँचने के लिए ढ़ाई अक्षर प्रेम की सलाह दी थी.
मुसीबत
मगर इन सारे पावन ग्रंथों और महान आत्माओं की नसीहत पर तिजारत हावी होती गई और दुनिया जीने वालों के लिए मुसीबत होती गई.
इस मुसीबत को किस्से कहानियों और कविताओं के रूप में वर्षों से शब्दबद्ध किया जा रहा है, मगर फिर भी यह मुसीबत कम होने का नाम नहीं ले रही.
दोहा लिखने के बाद मुझे लगा, बच्चा वाकई नादान था. उसकी नादानी ने मुझे भी अनजान बना दिया था. मैं बच्चों की आखों में हैरत देखकर भूल गया था कि ईश्वर के पास आने वालों की संख्या ज़्यादा होती है. किसी को धंधे में कामयाबी चाहिए. किसी को घर में हँसता-खेलता बच्चा चाहिए, किसी फ़िल्म निर्माता को फ़िल्म की सफलता चाहिए. सबको कुछ न कुछ चाहिए. इसलिए सबके लिए बड़े घर की आवश्यकता होती है.
बहुत से ऐसे काम जिन्हें वह ख़ुद करता है, और जिसका जिम्मेदार भी वह ख़ुद है. उनके लिए भी वह ख़ुदा का ही दरवाज़ा खटखटाता है. और वक़्त बेवक़्त उसे सताता है. चोर भी चोरी करने से पहले उसी को आवाज़ लगाता है.
डेनियल डिफो के मतानुसार, "जहाँ भी ख़ुदा अपना घर बनाता है उसी का पैदा किया हुआ शैतान भी वहीं करीब ही अपना छप्पर उठाता है." शैतान के पुजारियों की गिनती ईश्वर के उपासकों से हमेशा अधिक होती है. उसकी अपनी जगह जब छोटी पड़ती है, तो वह ख़ुदा के आँगनों में घुस आता है. ख़ुदा शांति प्रिय होता है. शैतान की इस हटधर्मी से टकराने के बजाए वह ख़ामोशी से अपना स्थान छोड़ कर किसी और जगह चल जाता है. सवाल उठता है, ख़ुदा के हाथ में तो सब कुछ है वह शैतान को ख़त्म क्यों नहीं कर देता? जवाब है ऐसा करने में उसके संसार की रंगीनी भी समाप्त हो जाएगी. रामायण से रावण को निकाल देने से, और आदम-हव्वा की कथा से शैतान को अलग कर देने से, इन पावन ग्रंथों की पूर्णता में अपूर्णता झाँकने लगेगी, डॉक्टर इक़बाल ने अपनी एक कविता में इस ओर इशारा भी किया है- इस में शैतान इंसान से कहता है,
गर कभी खिलवत (तन्हाई) मयस्सर हो तो पूछ अल्लाह सेकिस्स-ए-आदम को रंगीं कर गया किसका लहू
बाइबिल और कुरान में आदम को जन्नत से निकाले जाने की वजह शैतान को ही करार दिया गया है. पिछले कई सालों से, शैतान, जिसके नाम भाषा और ठिये उतने ही हैं जितने ख़ुदा के हैं. कुछ ज़्यादा ही फैलने लगा है. कहीं-कहीं तो उसके आतंक से, स्वयं ख़ुदा भी, जो बच्चों की मुस्कुराहट सा सुंदर है, माओं के चेहरों की जगमगहट सा आकर्षक है, गीता, कुरान, बाइबिल आदि की सजावट सा हसीन है, ग़मगीन और असुरक्षित जान पड़ता है.
उठ-उठ के मस्जिदों से नमाज़ी चले गएदहशतगरों के हाथ में इस्लाम रह गया
कट्टरपंथियों ने इस शेर पर विवाद खड़ा कर दिया था. लेकिन इस हक़ीकत से इंकार करना मुश्किल है कि वह अयोध्या हो, पंजाब में गोल्डन टेम्पल हो या आज के पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में लाल मस्जिद हो, ख़ुदा, राम या वाहगुरू कहीं भी महफूज नज़र नहीं आता.वह स्वयं अब अपनी हिफाज़त से दुखी दिखाई देता है.
लेकिन ख़ुदा सबकी ज़रूरत है. वह मुहब्बत की तरह खूबसूरत है. शैतान से भगवान को बचाने के लिए सूफी-संतों ने एक रास्ता सुझाया था और उन्होंने ख़ुदा को ईंट-पत्थरों के मकानों से निकालकर अपने दिलों में बसाया था. महात्मा बुद्ध के कई सौ साल बाद एक भिक्षु एक बर्फीली रात को जंगल में था, उसे दूर थोड़ी सी रौशनी दिखाई दी, उसने वहाँ जाकर दस्तक दी, आश्रम का द्वार खुला, भिक्षु को अंदर लिया गया और आश्रम का सेवक उसके लिए भोजन तैयार करने चला गया. जब भोजन लेकर वह वापस आया तो उसे यह देख कर गुस्सा आया, बुद्ध की काठ की मूर्ति जल रही है और भिक्षु उस पर हाथ ताप रहा है, सेवक ने क्रोध से कहा यह क्या अधर्म है, भिक्षु ने उत्तर में कहा, "मेरे अंदर जीवित महात्मा को सर्दी लग रही थी, इसलिए लकड़ी की प्रतिमा को आग बना दिया."
इंसान में भगवान का सम्मान ही संत की पहचान है. और जब ख़ुदा दिल में मिल जाता है तो दिल्ली के सूफी निजामुद्दीन का कौल याद आता है,
एक मुद्दत तक मैंने काबा (मक्का का पावन स्थल) का तवाफ़ (चक्कर) किया
मगर अब काबा मेरा तवाफ़ करता है.

टाइम मशीन

वक्त गतिशील है, डायनामिक है. यह हम सब मानते हैं, जानते हैं. 
पर यह अपने घेरे में घूमने वाला सर्कुलर मोशन है या लीनियर (जो कभी वापस अपने बिंदु पर वापिस नहीं आएगा). 
मुझको तो सर्कुलर ही लगता है. यह बात अलग है कि, सर्किल कितना बड़ा है? 
"मगर ऐसा लगता है कि रिपीटेंस तो है."
वीर को फीवर है... सुनते ही मैं घर वापस आ गया था.
ताप अधिक होने पर यह लल्लू लाल अनर्गल सा बर्ताव करने लगता है. हमारा प्रयास होता है कि क्रोसिन और ठंडे पानी की पट्टियों से उसका फीवर ज्यादा ना बड़ने पाए.
देर रात उसके सर पर पट्टियां बदलते हुए मैं एक किरदार निभा रहा था. वही किरदार जो कुछ दशकों पहले मैंने डैडी को निभाते देखा और महसूस किया था. 
बस वीर की जगह मैं और मेरी हथेली की जगह  डैडी की हथेली थी.
उन्हीं दशकों पुराने शब्दों और एहसासों को, मैं अगली पीढ़ी को ट्रांसफर कर रहा था.

"पापा चिंता मत करो मैं ठीक हूं." वीर के इन शब्दों ने मुझे मेरी टाइम यात्रा से बाहर निकाला.
पता नहीं क्यों लोग टाइम मशीन को फिक्शन का भाग मानते हैं? मुझे तो लगता है यह हम सब के अंदर बाय डिफॉल्ट built-in है.
कल ही की तो बात लगती है जब सन 2009 के बसंत में गंगा राम हॉस्पिटल के अंदर डैडी की एंडोस्कोपी हो रही थी. अटेंडेंट के कालम में मेरे साइन थे. अब कुछ दिनों पहले वीर की एंडोस्कोपी हो रही थी और फिर अटेंडेंट वाले कॉलम में मेरे साईन थे. 
पहले पिता और अब बेटा, कभी-कभी तो लगता है कि वीर के नाम पर डैडी ही अपनी अधूरी जिंदगी जी रहे हैं...

जो कौम इतिहास से नहीं सीखती

जब स्कूल में था तो इतिहास पढ़ते हुए अक्सर सोचता था कि, आखिर यह पढ़ाया क्यों जाता है ?
पाकिस्तान के खोखले Intaluctual हालात देख कर महसूस होता है कि वाकई इतिहास पढना जरूरी है और उससे भी ज्यादा जरूरी है सही इतिहास पढना.
बेचारे न मोहन-जोदाड़ो को हज़म कर पाते है ना ही भगत सिंह को. आखिर भगत को स्वीकारा तो उनकी धर्म की आलोचना को कैसे स्वीकारेंगे ? कैसे सुन पाएंगे उनके नास्तिकता के विचारों को. सिन्ध के राजा दाहिर, महाराजा रंजीत सिंह, तक्षशिला का महान विश्वविद्यालय इत्यादि इत्यादि... लिस्ट बहुत लंबी है.
गर्व करने लायक इतिहास है उस ज़मीन का, मगर एक पर्दा डाल दिया धर्म का. खत्म सब खत्म बस कलमे पर बना पाकिस्तान और इनकी ज़ज्बे वाली कौम.
" इसी ज़ज्बे ने इन्हे इतिहास से काट दिया, सिर्फ ज़ज्बात दे दिये."
जिन अफगानियों से पिट रहे है उन्ही के नाम पर इनकी मिसाइले है. अजीब चू... कौम है.
भूल गए उस महान रंजीत सिंह, हरि सिंह नलवा को जिन्होंने अफ़ग़ान आक्रमणों की परंपरा को रोका और पंजाब को स्थिरता दी.

हमें भी आँखों पर पर्दा डलने से बचना है, सही इतिहास ही पढ़ना और जानना है. अगर हमारा इतिहास सिर्फ हमारे अहम को फुला के गुब्बारा बना रहा है तो समझिए कहीं गड़बड़ है. इतिहास गलतियों का भी है. क्या हमें भी पड़ोसी की तरह एक फूला हुआ गुब्बारा ही बनना है.
हमें चार्वाक की नास्तिकता भी पढ़नी है, अष्टावक्र और कृष्ण की गीता भी. बुद्ध भी जानने है गुरु साहिबान भी.
इस्लाम से भी परिचित होना है इसाइयों से भी.
यहूदियों को भी जानना है, चीन की कन्फ़्यूशियस और परंपरा से भी परिचित होना है. अशोक भी पढना है औरंगजेब भी. आजाद कैसे हुए सिर्फ यही नहीं जानना यह भी जानना है कि आखिर गुलाम हुए क्यों ?
खुला रखना है अपने दिमाग की खिड़कियों को विचारों के लिए, वरना पड़ोसी जैसी सडांध आती शुरू हो जाएगी. कूप मंडूक नहीं बनना.

एक आटोमन साम्राज्य (आज का तुर्की) हुआ है जिसकी नींव अर्तुगुल गाजी ने रखी थी 1453 में  Mehmed II ने Constantine XI को हरा कर कोंटिस्टाइन नगर पर कब्जा किया था जिसे आज का Istambul भी कहते है.
जीतने के बाद Mehmed II से मिलने सोने के सिक्कों का तोहफा लेकर लूकस नोटरस आया जो कोन्टिस्टाइन की सैना का जनरल था और गद्दार था.
Mehmed II ने इन्हे देख कहा कि इनकी जरूरत तुम्हारे सम्राट और जनता को ज्यादा थी.
और आदेश दिया 
"सर कलम कर दो इसका"
ऐसे ही काफी उदाहरण भारतीय इतिहास में भी मौजूद है. हिन्दू और मुस्लिम शासकों दोनों में.
यह आपकी नज़र है और खासकर आपका नज़रिया है जो आपको सही तस्वीर दिखाता है.
"तो दोस्तों नज़र साफ और नजरिया दुरुस्त रखिए" फिर इतिहास जानिए...

वरना पड़ोसी के जैसे ही बौद्धिक कंगले (intellectually bank corrupt) हो जाओगे..
 



From My old Diary

जब मै कालेज में था तब डायरी लिखा करता था...
कुछ जो दिल को छु जाता था उसे नोट कर लिया करता था
 
There are two ways to live your life one is as though nothing is a miracle. 
The other is as though everything is a miracle.

सामने है जो उसे लोग बुरा कहते हैं 
जिसको देखा ही नहीं उसको खुद कहते हैं

जिंदगी तुझसे हर एक सांस पर समझौता करूं शौक जीने का है मुझको मगर इतना तो नहीं

खामोशी की मौत गवारा नहीं मुझको 
शीशा हूं टूट कर भी खाना छोड़ जाऊंगा

हजूमे गम मेरी फितरत बदल नहीं सकते 
क्या करूं मुझे आदत है मुस्कुराने की

मिली हवाओं में उड़ने की वह सजा यारो 
कि मैं जमीन के रिश्तो से कट गया यारों

कभी-कभी यूँ भी हमने अपने जी को बहलाया है 
जिन बातों को खुद ना समझे औरों को समझाया है

हमको मालूम है जन्नत की हकीकत लेकिन दिल को खुश रखने को ग़ालिब ख्याल अच्छा है

दिल दे तो इस मिजाज का परवरदिगार दे 
जो गम की घड़ी को भी खुशी में गुजरते

न था कुछ तो खुदा था, कुछ न होता तो खुदा होता 
डुबोया मुझको होने ने, ना होता मैं तो क्या होता

जिंदगी क्या है खुद ही समझ जाओगे 
कि बारिशों में पतंग उड़ाया करो

अपने गम को किसी और को दिखाया न जाए घर पर ही बिखरी हुई चीजों को सजाया जाए

धूप में निकलो घटाओं में नहा कर देखो 
जिंदगी क्या है किताबों को हटाकर देखो

दिल भी जिद पे अदा है किसी बच्चे की तरह या तो सब कुछ ही चाहिए या कुछ भी नहीं

जब भी किसी से कोई गिला रखना 
सामने अपने आईना रखना

ऐ खुदा रेत के सेहारा को समंदर करते 
या छलकती हुई आंखों को भी पत्थर कर दे

चांद के साथ कई दर्द पुराने निकले 
कितने गम थे जो तेरे गम के बहाने निकले

क़हकहा आंखों का बर्ताव बदल देता है 
हंसने वाले तुझे आंसू नजर आए कैसे

सच घटे या बड़े तो सच ना रहे 
झूठ की तो कोई इंतहा ही नहीं

किन राहों से दूर है मंजिल कौन सा रास्ता है आसान 
हम जब थक कर रुक जाएंगे औरों को समझाएंगे

खुदा हमको ऐसी खुदाई न दे 
कि अपने सिवा कुछ दिखाई न दे

हर तरफ हर जगह बेशुमार आदमी 
फिर भी तन्हाइयों का शिकार आदमी

औरों को हंसते देखो मनु 
हँसो और सुख पाओ 
अपने सुख को विस्तृत कर लो 
सबको सुखी बनाओ

उन्हें यह ज़िद कि मुझे देख कर किसी को ना देख 
मेरा यह शौंक की सबसे कलम करता चलूँ

वह मेरे सामने गया और मैं 
रास्ते की तरह देखता रह गया

मेरा कातिल ही मेरा मुंसिफ है 
क्या मेरे हक में फैसला देगा

आखरी हिचकी तेरी बाहों में आए 
मौत भी मैं शायराना चाहता हूं

कारगर मेरी दुआ हो यह जरूरी तो नहीं,
मैं जो मांगू वह आता हो यह जरूरी तो नहीं. शेख करता तो है मस्जिद में खुद को सजदे, उसके दिल में भी खुदा हो यह जरूरी तो नहीं. खामोशी भी तो बाअंदाजे गिला होती है, शिकवा होठों से अदा हो यह जरूरी तो नहीं. इश्क ने साज ए मोहब्बत पर गजल छेड़ी है 
हुस्न भी नगमा ए सरा हो यह जरूरी तो नहीं. तीराबख्ती में भी जीने का मजा है मंजर, 
ऐश ही जुज्बे बका हो यह जरूरी तो नहीं.

तीराबख्ती- तकलीफ
जुज्बे बका- चिरस्थायी
नगमा ए सरा- संपूर्ण गीत

I do not love you, 
for
What you are
But for
What I am with you...

दो और दो का जोड़ हमेशा चार कहां होता है सोच समझ वालों को थोड़ी नादानी दे मौला

मेरी आवाज ही पर्दा है मेरे चेहरे का 
मैं हूं ख़ामोश जहां मुझको वहां से सुनिए

कोई हाथ भी ना मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से 
यह नए मिज़ाज का शहर है जरा मिला करो फासले से

कोई देता है दिल को मुसलसल आवाज; 
और फिर अपनी ही आवाज से घबराता है.
अपने बदले हुए अंदाज का एहसास नहीं; 
मेरे बहके हुए अंदाज से घबराता है.
राज को है किसी हमराज की मुद्दत से तलाश; और दिल है कि सोहबते हमराज से घबराता है. शौक यह की उड़े वह तो जमीन साथ उड़े; हौसला यह की परवाज से घबराता है.
तेरी तकदीर में आसाइश ए अंजाम नहीं; 
कि तू शोरिश ए आगाज़ से घबराता है.


ना मैं तलाश करूं 
तुम में 
जो नहीं हो तुम 
ना तुम तलाश करो मुझ में 
जो नहीं हूं मैं


यह बात उन दिनों की है 
जब इस ज़मी पर 
इबादत घरों की जरूरत नहीं थी 
मुझी में 
खुद था...!


और तो सब कुछ ठीक है
लेकिन कभी कभी यूँ ही
चलता फिरता शहर, अचानक
तन्हा लगता है...


फासला
चांद बना देता है 
हर पत्थर को 


शहर में सबको कहां मिलती है रोने की जगह अपनी इज्जत भी यहां हँसने हँसाने से रही


मोहब्बत में नहीं है फ़र्क जीने और मरने का
उसी को देखकर जीते हैं जिस काफिर पे दम निकले


हर आदमी में होते हैं दस बीस आदमी
जिसको भी देखना हो कई कई बार देखना


एक पल में हम वहां से उठे 
जहां बैठने में हमें जमाने लगे


अच्छा है दिल के पासवाने रहे अक्ल 
पर कभी-कभी इस तनहा भी छोड़िए

He who wins 
most of the arguments 
has fewest friends

Man is not only responsible for what he does; he is also responsible for what happens to him...
(Lala ji & Daddy)


He who is afraid to ask is ashamed of learning.


Our five senses are incomplete without the sixth one...
'Common Sense'


A Smile is a curve 
which can put 
lot of things 
Straight !


ख़ामोशी भी बा- अंदाज- ए गिला होती है
जरूरी तो नहीं शिकवा होठों से अता हो


We are not chemicle 
We are human
We can think
Before Reaction


क्यूं डरे 
जिन्दगी में 
क्या होगा
कुछ 
ना होगा 
तो 
तजुर्बा होगा