Friday, April 29, 2022

बुद्धत्व

बुद्धत्व क्या है
किसी का मन, वचन और कर्म से...
सरल
सहज
सजग
हो जाना.

Friday, November 12, 2021

सृष्टि

सृष्टि 
एक चक्र है 
जहां शुरु 
वहीं खत्म है,
और
जहाँ खत्म 
वही शुरू...

Tuesday, May 18, 2021

JAWAHAR 18 JANUARY

दोस्तों में से एक दोस्त की फिजिकल प्रेजेंस कम हो गई। virtually तो वह कभी अलग हो ही नहीं सकता।
19 जनवरी 2020 संडे सुबह काम पर जाने के लिए तैयार हो रहा था। एक टांग पेंट में और दूसरी अंदर जाने की तैयारी में थी, कि फोन घन घना उठा. नजर पड़ी तो कपिल का था. अक्सर इतनी सुबह हम दोस्तों को एक-दूसरे को फोन करने की आदत नहीं है. निशाचर जो ठहरे. आधा अंदर और आधा बाहर वाली स्थिति में ही मोबाइल उठाया.
" मेहता,जवाहर नहीं रहा." कुछ मिनट्स का pause... दूसरी टांग पर ठंड अब ज्यादा महसूस होने लगी थी। पर हाथ थे कि चल ही नहीं रहे थे। यह कुछ चंद लम्हे कई सालों जैसे लंबे महसूस हो रहे थे।
"राजीव का फोन आया था।"
उसने बोला।
कपिल की आवाज किसी रोबोट जैसी संवेदनहीन लग रही थी। यतेंद्र को फोन किया तो उसकी शुरुआत हुई भैनचौ... कोई दोस्त ही ऐसा रिएक्शन दे सकता है। हरीश हमेशा की तरह हम सबसे ज्यादा संयत था। पॉल द ग्रेट हर्ट थे और मणिपुर से अपनी भावना इजहार कर रहे थे।
मुनीश से कोई संपर्क नहीं हो पा रहा था और लवलीन बिल्कुल ब्लैंक थी।
लगातार अपने अपने स्त्रोतों को खंगाला जा रहा था, जो लंदन से हमें सही सिचुएशन बता सके। ऑफिस जाने का मन और हिम्मत दोनों ही नहीं थे। हम सब cricess of recation से गुजर रहे थे। क्या react करें कैसे react करें कुछ समझ ही नहीं आ रहा था। कोई गालियां दे रहा था, कोई हंस रहा था, कोई बिल्कुल सदमे में था, कोई बिलकुल  चुप तो कोई बहुत बड़बड़ा रहा था। कभी ऐसा भी होगा सोचा ही ना था।
एक दूसरे को दिन भर फोन इसलिए नहीं होते रहे कि कोई जरूरत थी, बल्कि एक दूसरे से बात करके ही हम खुद को समझाने की कोशिश कर रहे थे। दीपा (जवाहर की बहन) से बात करने की हिम्मत ही नहीं हो पा रही थी। राधाकृष्णन,अमिताभ, हिमांशु, प्रियंका इत्यादि इत्यादि सभी से अचानक ही कई सालों के बाद मैसेजिंग चालू हो गई... कड़ी जवाहर ही था।
फेसबुक अपडेट देखकर ऐसे कई फोन आने चालू हुए जिनको मैं जानता ही नहीं था, वह जवाहर के schoolmates या ऑफिस कलीग थे। यह जवाहर का व्यक्तित्व ही था कि जो उससे मिला, हमेशा के लिए उसी का हो गया। हम दोस्तों के बीच का अटल बिहारी यानी आजाद शत्रु था।

ग्रेजुएशन फर्स्ट ईयर की बात है- शायद फर्स्ट क्वार्टर की,

हम दोनों डीटीसी की U SPECIAL में थे मैंने पूछा यार कोर्स कैसा चल रहा है? तपाक से जवाब आया कि मैंने तो SYLLABUS पूरा भी कर लिया। एक गजब का CONFIDANCE था साले मे।
और वाकई जवाहर तूने लाइफ का सिलेबस सबसे पहले पूरा किया।
Kasturi Rangan Jawahar
K R Jawahar
02/10/1975 to 18/01/2020

Friday, January 15, 2021

ओस की बूँद

कह देना समन्दर से 
हम ओस के मोती हैं 
दरिया की तरह 
तुमसे मिलने नहीं आएंगे...!

ओस की बूंद से 
बोला समन्दर,

भाप बन जाओगे, 
फिर बरस कर 
मुझ तक ही आओगे।

Wednesday, December 9, 2020

दांव

कभी यूं भी आजमाओ नसीब को अपने 
कि दांव पर लगे हो नकाब सब अपने.

Sunday, September 27, 2020

आदमी

बड़ी अजीब 
कौम
है 
ये।
जानवर बोलो 
तो 
नाराज, 
शेर बोलो 
तो 
लाजवाब 
है
ये।

Wednesday, September 16, 2020

माफी चाहता हूं

आज हिंदी दिवस है. व्हाट्सएप और फेसबुक संदेशों से लबालब भरे हुए हैं.
हिंदी पर लोगों का गर्व आज उमड़ घुमड़ कर मर मिटने को तैयार है.
कभी-कभी लगता है कि हम लोग गर्व की जगह अभिमान की अभिव्यक्ति करते हैं.
गर्व का आधार ज्ञान है.अभिमान का तो कोई आधार ही नहीं है. वह तो हवा पर तशरीफ़ फरमाता है. ज्यादा हवा से चलती गाड़ी और उसमें सवार जिंदगी को,कम हवा की बनिस्पत ज्यादा खतरा है. तो आइए लगे हाथ कुछ हवा कम करते हैं और अभिमान को गर्व तक सीमित करते हैं.
फारसी,उर्दू और अंग्रेजी के बाद हिंदी शासकीय भाषा बनी. शासन बदला भाषा बदली अतः गर्व भाषा का नहीं शासन से संबंधित था.
आज छोटे-छोटे बच्चे जो शानदार हिंदी के वाक्यों को को बोलकर मां बाप को चकित कर रहे हैं ना, उसका श्रेय आप की सरकारों और हिन्दी लेखको को नहीं बल्कि पसंदीदा कार्टूंस को बेहतरीन आम बोलचाल की भाषा में डब करने को जाता है.
थलाइवा,अन्ना,तंबी, वानक्कम इत्यादि से हिंदी भाषी लोगों की जो हेलो हेलो हुई है ना, उसका श्रेय साहित्य में हीन दर्जे पर माने जाने वाली हिंदी व्यवसायिक फिल्मों को जाता है.
बाल्मीकि रामायण का पहला अनुवाद हिंदी में नहीं हुआ था. यह असमि मे माधव कांदिली रामायण थी. इसकी रचना 14वी शताब्दी में हुई थी. तुलसीदास की रामचरितमानस कई शताब्दियों बात लिखी गई थी.
भाषा को सरल, सहज, सुलभ बनने दें. सर्वग्रही बने, कुएं के मेंढक नहीं. गर्व तक तो ठीक है, मगर उन्माद नहीं. भाषा को थोपिए नहीं पानी जैसे बहने दीजिए, रास्ता खुद-ब-खुद बनता चला जाएगा. 
अपनत्व का भाव दीजिए सारी देसी भाषाएं हमारी अपनी हैं. दक्षिण,पश्चिम और पूर्वी भाषाओं का साहित्य सर्जन कहीं भी हिंदी से कम नहीं है. पंजाबी भाषा सूफी साहित्य की खान है.
दिल दुखा हो तो माफी चाहता हूं.