Friday, January 15, 2021

ओस की बूँद

कह देना समन्दर से 
हम ओस के मोती हैं 
दरिया की तरह 
तुमसे मिलने नहीं आएंगे...!

ओस की बूंद से 
बोला समन्दर,

भाप बन जाओगे, 
फिर बरस कर 
मुझ तक ही आओगे।

Wednesday, December 9, 2020

दांव

कभी यूं भी आजमाओ नसीब को अपने 
कि दांव पर लगे हो नकाब सब अपने.

Sunday, September 27, 2020

आदमी

बड़ी अजीब 
कौम
है 
ये।
जानवर बोलो 
तो 
नाराज, 
शेर बोलो 
तो 
लाजवाब 
है
ये।

Wednesday, September 16, 2020

माफी चाहता हूं

आज हिंदी दिवस है. व्हाट्सएप और फेसबुक संदेशों से लबालब भरे हुए हैं.
हिंदी पर लोगों का गर्व आज उमड़ घुमड़ कर मर मिटने को तैयार है.
कभी-कभी लगता है कि हम लोग गर्व की जगह अभिमान की अभिव्यक्ति करते हैं.
गर्व का आधार ज्ञान है.अभिमान का तो कोई आधार ही नहीं है. वह तो हवा पर तशरीफ़ फरमाता है. ज्यादा हवा से चलती गाड़ी और उसमें सवार जिंदगी को,कम हवा की बनिस्पत ज्यादा खतरा है. तो आइए लगे हाथ कुछ हवा कम करते हैं और अभिमान को गर्व तक सीमित करते हैं.
फारसी,उर्दू और अंग्रेजी के बाद हिंदी शासकीय भाषा बनी. शासन बदला भाषा बदली अतः गर्व भाषा का नहीं शासन से संबंधित था.
आज छोटे-छोटे बच्चे जो शानदार हिंदी के वाक्यों को को बोलकर मां बाप को चकित कर रहे हैं ना, उसका श्रेय आप की सरकारों और हिन्दी लेखको को नहीं बल्कि पसंदीदा कार्टूंस को बेहतरीन आम बोलचाल की भाषा में डब करने को जाता है.
थलाइवा,अन्ना,तंबी, वानक्कम इत्यादि से हिंदी भाषी लोगों की जो हेलो हेलो हुई है ना, उसका श्रेय साहित्य में हीन दर्जे पर माने जाने वाली हिंदी व्यवसायिक फिल्मों को जाता है.
बाल्मीकि रामायण का पहला अनुवाद हिंदी में नहीं हुआ था. यह असमि मे माधव कांदिली रामायण थी. इसकी रचना 14वी शताब्दी में हुई थी. तुलसीदास की रामचरितमानस कई शताब्दियों बात लिखी गई थी.
भाषा को सरल, सहज, सुलभ बनने दें. सर्वग्रही बने, कुएं के मेंढक नहीं. गर्व तक तो ठीक है, मगर उन्माद नहीं. भाषा को थोपिए नहीं पानी जैसे बहने दीजिए, रास्ता खुद-ब-खुद बनता चला जाएगा. 
अपनत्व का भाव दीजिए सारी देसी भाषाएं हमारी अपनी हैं. दक्षिण,पश्चिम और पूर्वी भाषाओं का साहित्य सर्जन कहीं भी हिंदी से कम नहीं है. पंजाबी भाषा सूफी साहित्य की खान है.
दिल दुखा हो तो माफी चाहता हूं.

Monday, June 22, 2020

आईना

हर आईना 
सच्चाई नहीं 
दिखाता,
कुछ आईने 
मेले मे 
बच्चों को
लोटपोट 
करने 
के लिये
भी
होते है।।
कुछ 
रुपयों की 
टिकट 
होती है
इन पर...
कहीं मोटा
कहीं पतला
तो
कहीं पिल-पिला
सा दिखता है
अक्स...
खूब 
हंसता था 
बचपन में 
देख कर 
इनको।
नेता नगरी
के कुछ 
नेता भी
ऐसे ही
अक्स 
दिखा 
रहे है
खुद को
सच्चाई का
आईना 
कह
फ्री मे
जनता को
लोट-पोट
किए
जा
रहे है।
हर आईना सच्चाई नहीं दिखाता 
हर आइना सही अक्स नहीं दिखाता।।

Saturday, May 30, 2020

18 नवंबर

18 नवंबर 2010 दोपहर,ऑपरेशन थिएटर में एफएम चल रहा था. डॉ मालविका,डॉक्टर शिवानी, उनकी 2 असिस्टेंट,एक एनेस्थेटिक के अलावा टेबल पर मीतू और साथ में स्टूल पर में था।
मीतू के पेट में चीरा लगा कर डॉक्टर ने कुछ मांस की परतें और खोली। स्टील के अर्धचंद्राकार इक्विपमेंट को उस कट में फिट किया गया।

एक पानी से फूले हुए गुब्बारे नुमा थैली जो बाहर की तरफ निकल रही थी उसको चीरा लगाया...और चारों तरफ उस LIQID की छींटे उछल गई।
एक बड़े चम्मच नुमा(service spoon जैसा) उपकरण को cut के अंदर डाल कर कुछ खींचा जा रहा था... हल्के बालों सहित यह तुम्हारा सिर था जो मुझको सबसे पहले दिखा था।धीरे से तुम को बाहर निकाला तो सबसे पहले यह तुम्हारे रोने की आवाज थी जो मैने और मीतू ने सुनी थी। मीतू और तुम्हारे बीच जो अंबिलिकल कॉर्ड थी उसको काट कर तुमको अलग किया गया।
Umbilical cord से स्टेम सेल को अलग करके सुरक्षित रखने वाली कंपनी के नुमाइंदे के हाथ पूरी व्यवसायिक तेजी से चल रहे थे।

खून का लाल रंग सब तरफ था। डॉक्टर के हाथ पर टेबल पर जमीन पर, मगर पहली बार फैला हुआ खून भी सकून दे रहा था।

नर्स तुमको अपने हाथों में उठा कर साफ़ करने के लिए जाने लगी...अचानक मुङी और तुमको मेरे पास ले आई यह मैंने और मीतू ने तुम को पहली बार देखा था।

" मां-बाप,दादा-दादी,चाचू-चाची, नाना-नानी,मामा-मामी बुआ-फूफा सब एक झटके में पैदा हो गए थे।"

कहते हैं आज तुम्हारा जन्मदिन है।मुझको तो इन सब रिश्तो का जन्मदिन लगता है। प्रभु तुम्हें ऐसी प्रज्ञा से नवाजे कि तुम हमेशा रिश्तो की गर्माहट का आनंद लेते रहो स्वस्थ रहो मुस्कुराते रहो।

14 जुलाई

दादी का देहांत हुए लगभग 5 साल होने वाले हैं. उनके इंतकाल यानी 14 जुलाई से एक हफ्ता पहले हॉस्पिटल प्रवास के दौरान दादी के साथ कई यादें जुड़ी हुई है.

वीर उनकी चौथी पीढ़ी था. वीर के जन्म पर दादा-दादी (जिनको हम सब पापा जी भाबी जी कहते थे) के चेहरे के भाव उनके उल्लास को बयान कर रहे थे. साथ ही साथ अपने बड़े बेटे (यानी डैडी) को खो चुकने का दर्द भी कहीं ना कहीं छलक उठता था.

90-92 की उम्र में भी वीर के साथ पापा जी का दरवाजे के पीछे से लुका छुपी खेलना...अलग अलग तरह से आवाजें निकालकर, उसकी मुस्कुराहट देखकर लाजवाब हो जाना...
भाभी जी के बिस्तर पर चढ़कर उनको टांगे मारना, बिस्तर खराब कर देना... इन पर भी भाव-विभोर होना.
इन सबका मैं साक्षी हो पाया यह मेरा सौभाग्य ही तो था.

खैर फिर वापस हॉस्पिटल पर आते हैं.

रूम से आईसीयू,आईसीयू से रूम फिर आईसीयू इन सबके बीच की अदला बदली के बावजूद,दादी कभी भी नहीं भूली थी कि वीर के मुंडन उन्होंने 14 जुलाई के लिए तय किए हैं.
परिवार से जो भी मिलने आता,उसे यही याद करवाते कि मुंडन 14 जुलाई को ही होने हैं.
मुण्डन बाद मे करवाने के मेरे प्रस्ताव को उनके इसरार भरे उत्तर ने खारिज कर दिया था.

पास बैठी नीतू आंटी और सीता आंटी को उन्होंने बुलाया, मुंडन के सारे रीति-रिवाज समझाएं और पूरा करने की जिम्मेदारी दी.

"हलवा बनाकर थाली में रखना. उसको बकरे का आकार देना.और फिर उसे कृपान से काटना."
सलाम है मेरे पुरखों को जिन्होंने बलि देने के रिवाज में तब्दीली लाते हुए उसको हलवे के बकरे में बदला.

12 या 13 जुलाई को पाबी जी ने रिस्पांस देना बंद कर दिया था. मैंने पवन अंकल,मम्मी और मीतू ने निर्णय लिया कि मुंडन भाभी जी की इच्छा के मुताबिक ही होंगे.

14 जुलाई सुबह सुबह नाई को उस्तरा चमकाने का मौका दिया गया.सारी रस्में पूरी की गई. जैसे ही नाई अंतिम उस्तरा उतारकर अलग हुआ...फोन घन घना उठा नरेश अंकल फोन पर थे. भाबी जी ने बस अभी अंतिम सांस ली है. मैं इस कहानी, इस अनुभव को कंनक्लूड नहीं कर पाया और ना ही कर पाऊंगा.
शायद मैं चाहता ही यही हूं कि कोई निष्कर्ष ना निकाला जाए. सिर्फ भावनाएं और संवेदनाएं ही रहे.