Wednesday, March 11, 2026

ISHWAR

hello everyone...

jab ham paida hue sab se pehley hamrey kaan mai jo shaabd aye woo they "bhagwa/allah/god " ham tabhee se condition hote chale gaye,BHAGWAN ke es concept se.

KYA Bhagwan/God/Allah exist kartey hai yaan sirf concept hee exist kartey hai....

KYA ham sab ek pre-programed system ke tareh he es concept follow karet hai.....

This quest took me to Bhagat Singh "y i'm an athist" a very logical/rational monograph....by a young man at the age of 22

at the same time Osho deals this issue at the ground of philosophy.

everyone here welcome ro contribute views....

This articale is written by famous urdu poet NIDA FAZALI

इंसानों की दुनिया में इंसानों ने ईश्वर को खोज निकाला. इसलिए कि उसे एक तराजू की तरह इस्तेमाल किया जा सके.
उसके माध्यम से अच्छाई-बुराई को तोला जा सके और यह बताया जा सके कि समाज में कौन सच के रास्ते पर चल रहा है और कौन झूठ के रास्ते में बदल रहा है.
ईश्वर की खोज जंगल को बस्ती बनाने के लिए ज़रूरी थी, लेकिन समय के साथ इस एक ईश्वर को कई हिस्सों में बाँट दिया गया...ईश्वर के इस बँटवारे ने सारी धरती को कई-कई टुकड़ों में बाँट दिया.
और फिर वही वरदान जो इंसान को इंसान बनाने के लिए आकाश से ज़मीन पर उतारा गया था...अलग-अलग दुकानों में सजाकर तिजारत बना दिया गया.
तिजारत
इस तिजारत ने वह मुसीबत फैलाई कि हज़ारों समाज फिर से बस्ती से निकलकर जंगल की ओर जाने लगे.
भारत का विभाजन इसी ईश्वर के ग़लत इस्तेमाल का नतीजा था. जो आज़ादी से अब तक एक नासूर की तरह रिस रहा है और न जाने कब तक यूँ ही रिसता रहेगा.
पहले एक ईश्वर को कई नामों से पुकारा जाता था. कोई उसे ख़ुदा के नाम से जानता था, तो कोई उसे गॉड के नाम से पहचानता था.
लेकिन हर धर्म में उसके नाम भले ही अलग-अलग हों, वह हर रूप में भेदभाव की सीमाओं से दूर था.
हिंदू धर्म में वह कण-कण में व्याप्त था, इस्लाम में वह तमाम आलमों का रखवाला था, बाइबल में जब प्रकाश को जागृत होने का आदेश दिया गया था तो वह रोशनी सारे संसार के लिए थी.
नानक ने एक ही नूर से सारे जग के उपजने की सीख दी थी और कबीर दास ने उस तक पहुँचने के लिए ढ़ाई अक्षर प्रेम की सलाह दी थी.
मुसीबत
मगर इन सारे पावन ग्रंथों और महान आत्माओं की नसीहत पर तिजारत हावी होती गई और दुनिया जीने वालों के लिए मुसीबत होती गई.
इस मुसीबत को किस्से कहानियों और कविताओं के रूप में वर्षों से शब्दबद्ध किया जा रहा है, मगर फिर भी यह मुसीबत कम होने का नाम नहीं ले रही
नानक ने एक ही नूर से सारे जग के उपजने की सीख दी थी और कबीर दास ने उस तक पहुँचने के लिए ढ़ाई अक्षर प्रेम की सलाह दी थी.
मुसीबत
मगर इन सारे पावन ग्रंथों और महान आत्माओं की नसीहत पर तिजारत हावी होती गई और दुनिया जीने वालों के लिए मुसीबत होती गई.
इस मुसीबत को किस्से कहानियों और कविताओं के रूप में वर्षों से शब्दबद्ध किया जा रहा है, मगर फिर भी यह मुसीबत कम होने का नाम नहीं ले रही.
दोहा लिखने के बाद मुझे लगा, बच्चा वाकई नादान था. उसकी नादानी ने मुझे भी अनजान बना दिया था. मैं बच्चों की आखों में हैरत देखकर भूल गया था कि ईश्वर के पास आने वालों की संख्या ज़्यादा होती है. किसी को धंधे में कामयाबी चाहिए. किसी को घर में हँसता-खेलता बच्चा चाहिए, किसी फ़िल्म निर्माता को फ़िल्म की सफलता चाहिए. सबको कुछ न कुछ चाहिए. इसलिए सबके लिए बड़े घर की आवश्यकता होती है.
बहुत से ऐसे काम जिन्हें वह ख़ुद करता है, और जिसका जिम्मेदार भी वह ख़ुद है. उनके लिए भी वह ख़ुदा का ही दरवाज़ा खटखटाता है. और वक़्त बेवक़्त उसे सताता है. चोर भी चोरी करने से पहले उसी को आवाज़ लगाता है.
डेनियल डिफो के मतानुसार, "जहाँ भी ख़ुदा अपना घर बनाता है उसी का पैदा किया हुआ शैतान भी वहीं करीब ही अपना छप्पर उठाता है." शैतान के पुजारियों की गिनती ईश्वर के उपासकों से हमेशा अधिक होती है. उसकी अपनी जगह जब छोटी पड़ती है, तो वह ख़ुदा के आँगनों में घुस आता है. ख़ुदा शांति प्रिय होता है. शैतान की इस हटधर्मी से टकराने के बजाए वह ख़ामोशी से अपना स्थान छोड़ कर किसी और जगह चल जाता है. सवाल उठता है, ख़ुदा के हाथ में तो सब कुछ है वह शैतान को ख़त्म क्यों नहीं कर देता? जवाब है ऐसा करने में उसके संसार की रंगीनी भी समाप्त हो जाएगी. रामायण से रावण को निकाल देने से, और आदम-हव्वा की कथा से शैतान को अलग कर देने से, इन पावन ग्रंथों की पूर्णता में अपूर्णता झाँकने लगेगी, डॉक्टर इक़बाल ने अपनी एक कविता में इस ओर इशारा भी किया है- इस में शैतान इंसान से कहता है,
गर कभी खिलवत (तन्हाई) मयस्सर हो तो पूछ अल्लाह सेकिस्स-ए-आदम को रंगीं कर गया किसका लहू
बाइबिल और कुरान में आदम को जन्नत से निकाले जाने की वजह शैतान को ही करार दिया गया है. पिछले कई सालों से, शैतान, जिसके नाम भाषा और ठिये उतने ही हैं जितने ख़ुदा के हैं. कुछ ज़्यादा ही फैलने लगा है. कहीं-कहीं तो उसके आतंक से, स्वयं ख़ुदा भी, जो बच्चों की मुस्कुराहट सा सुंदर है, माओं के चेहरों की जगमगहट सा आकर्षक है, गीता, कुरान, बाइबिल आदि की सजावट सा हसीन है, ग़मगीन और असुरक्षित जान पड़ता है.
उठ-उठ के मस्जिदों से नमाज़ी चले गएदहशतगरों के हाथ में इस्लाम रह गया
कट्टरपंथियों ने इस शेर पर विवाद खड़ा कर दिया था. लेकिन इस हक़ीकत से इंकार करना मुश्किल है कि वह अयोध्या हो, पंजाब में गोल्डन टेम्पल हो या आज के पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में लाल मस्जिद हो, ख़ुदा, राम या वाहगुरू कहीं भी महफूज नज़र नहीं आता.वह स्वयं अब अपनी हिफाज़त से दुखी दिखाई देता है.
लेकिन ख़ुदा सबकी ज़रूरत है. वह मुहब्बत की तरह खूबसूरत है. शैतान से भगवान को बचाने के लिए सूफी-संतों ने एक रास्ता सुझाया था और उन्होंने ख़ुदा को ईंट-पत्थरों के मकानों से निकालकर अपने दिलों में बसाया था. महात्मा बुद्ध के कई सौ साल बाद एक भिक्षु एक बर्फीली रात को जंगल में था, उसे दूर थोड़ी सी रौशनी दिखाई दी, उसने वहाँ जाकर दस्तक दी, आश्रम का द्वार खुला, भिक्षु को अंदर लिया गया और आश्रम का सेवक उसके लिए भोजन तैयार करने चला गया. जब भोजन लेकर वह वापस आया तो उसे यह देख कर गुस्सा आया, बुद्ध की काठ की मूर्ति जल रही है और भिक्षु उस पर हाथ ताप रहा है, सेवक ने क्रोध से कहा यह क्या अधर्म है, भिक्षु ने उत्तर में कहा, "मेरे अंदर जीवित महात्मा को सर्दी लग रही थी, इसलिए लकड़ी की प्रतिमा को आग बना दिया."
इंसान में भगवान का सम्मान ही संत की पहचान है. और जब ख़ुदा दिल में मिल जाता है तो दिल्ली के सूफी निजामुद्दीन का कौल याद आता है,
एक मुद्दत तक मैंने काबा (मक्का का पावन स्थल) का तवाफ़ (चक्कर) किया
मगर अब काबा मेरा तवाफ़ करता है.

टाइम मशीन

वक्त गतिशील है, डायनामिक है. यह हम सब मानते हैं, जानते हैं. 
पर यह अपने घेरे में घूमने वाला सर्कुलर मोशन है या लीनियर (जो कभी वापस अपने बिंदु पर वापिस नहीं आएगा). 
मुझको तो सर्कुलर ही लगता है. यह बात अलग है कि, सर्किल कितना बड़ा है? 
"मगर ऐसा लगता है कि रिपीटेंस तो है."
वीर को फीवर है... सुनते ही मैं घर वापस आ गया था.
ताप अधिक होने पर यह लल्लू लाल अनर्गल सा बर्ताव करने लगता है. हमारा प्रयास होता है कि क्रोसिन और ठंडे पानी की पट्टियों से उसका फीवर ज्यादा ना बड़ने पाए.
देर रात उसके सर पर पट्टियां बदलते हुए मैं एक किरदार निभा रहा था. वही किरदार जो कुछ दशकों पहले मैंने डैडी को निभाते देखा और महसूस किया था. 
बस वीर की जगह मैं और मेरी हथेली की जगह  डैडी की हथेली थी.
उन्हीं दशकों पुराने शब्दों और एहसासों को, मैं अगली पीढ़ी को ट्रांसफर कर रहा था.

"पापा चिंता मत करो मैं ठीक हूं." वीर के इन शब्दों ने मुझे मेरी टाइम यात्रा से बाहर निकाला.
पता नहीं क्यों लोग टाइम मशीन को फिक्शन का भाग मानते हैं? मुझे तो लगता है यह हम सब के अंदर बाय डिफॉल्ट built-in है.
कल ही की तो बात लगती है जब सन 2009 के बसंत में गंगा राम हॉस्पिटल के अंदर डैडी की एंडोस्कोपी हो रही थी. अटेंडेंट के कालम में मेरे साइन थे. अब कुछ दिनों पहले वीर की एंडोस्कोपी हो रही थी और फिर अटेंडेंट वाले कॉलम में मेरे साईन थे. 
पहले पिता और अब बेटा, कभी-कभी तो लगता है कि वीर के नाम पर डैडी ही अपनी अधूरी जिंदगी जी रहे हैं...

जो कौम इतिहास से नहीं सीखती

जब स्कूल में था तो इतिहास पढ़ते हुए अक्सर सोचता था कि, आखिर यह पढ़ाया क्यों जाता है ?
पाकिस्तान के खोखले Intaluctual हालात देख कर महसूस होता है कि वाकई इतिहास पढना जरूरी है और उससे भी ज्यादा जरूरी है सही इतिहास पढना.
बेचारे न मोहन-जोदाड़ो को हज़म कर पाते है ना ही भगत सिंह को. आखिर भगत को स्वीकारा तो उनकी धर्म की आलोचना को कैसे स्वीकारेंगे ? कैसे सुन पाएंगे उनके नास्तिकता के विचारों को. सिन्ध के राजा दाहिर, महाराजा रंजीत सिंह, तक्षशिला का महान विश्वविद्यालय इत्यादि इत्यादि... लिस्ट बहुत लंबी है.
गर्व करने लायक इतिहास है उस ज़मीन का, मगर एक पर्दा डाल दिया धर्म का. खत्म सब खत्म बस कलमे पर बना पाकिस्तान और इनकी ज़ज्बे वाली कौम.
" इसी ज़ज्बे ने इन्हे इतिहास से काट दिया, सिर्फ ज़ज्बात दे दिये."
जिन अफगानियों से पिट रहे है उन्ही के नाम पर इनकी मिसाइले है. अजीब चू... कौम है.
भूल गए उस महान रंजीत सिंह, हरि सिंह नलवा को जिन्होंने अफ़ग़ान आक्रमणों की परंपरा को रोका और पंजाब को स्थिरता दी.

हमें भी आँखों पर पर्दा डलने से बचना है, सही इतिहास ही पढ़ना और जानना है. अगर हमारा इतिहास सिर्फ हमारे अहम को फुला के गुब्बारा बना रहा है तो समझिए कहीं गड़बड़ है. इतिहास गलतियों का भी है. क्या हमें भी पड़ोसी की तरह एक फूला हुआ गुब्बारा ही बनना है.
हमें चार्वाक की नास्तिकता भी पढ़नी है, अष्टावक्र और कृष्ण की गीता भी. बुद्ध भी जानने है गुरु साहिबान भी.
इस्लाम से भी परिचित होना है इसाइयों से भी.
यहूदियों को भी जानना है, चीन की कन्फ़्यूशियस और परंपरा से भी परिचित होना है. अशोक भी पढना है औरंगजेब भी. आजाद कैसे हुए सिर्फ यही नहीं जानना यह भी जानना है कि आखिर गुलाम हुए क्यों ?
खुला रखना है अपने दिमाग की खिड़कियों को विचारों के लिए, वरना पड़ोसी जैसी सडांध आती शुरू हो जाएगी. कूप मंडूक नहीं बनना.

एक आटोमन साम्राज्य (आज का तुर्की) हुआ है जिसकी नींव अर्तुगुल गाजी ने रखी थी 1453 में  Mehmed II ने Constantine XI को हरा कर कोंटिस्टाइन नगर पर कब्जा किया था जिसे आज का Istambul भी कहते है.
जीतने के बाद Mehmed II से मिलने सोने के सिक्कों का तोहफा लेकर लूकस नोटरस आया जो कोन्टिस्टाइन की सैना का जनरल था और गद्दार था.
Mehmed II ने इन्हे देख कहा कि इनकी जरूरत तुम्हारे सम्राट और जनता को ज्यादा थी.
और आदेश दिया 
"सर कलम कर दो इसका"
ऐसे ही काफी उदाहरण भारतीय इतिहास में भी मौजूद है. हिन्दू और मुस्लिम शासकों दोनों में.
यह आपकी नज़र है और खासकर आपका नज़रिया है जो आपको सही तस्वीर दिखाता है.
"तो दोस्तों नज़र साफ और नजरिया दुरुस्त रखिए" फिर इतिहास जानिए...

वरना पड़ोसी के जैसे ही बौद्धिक कंगले (intellectually bank corrupt) हो जाओगे..
 



From My old Diary

जब मै कालेज में था तब डायरी लिखा करता था...
कुछ जो दिल को छु जाता था उसे नोट कर लिया करता था
 
There are two ways to live your life one is as though nothing is a miracle. 
The other is as though everything is a miracle.

सामने है जो उसे लोग बुरा कहते हैं 
जिसको देखा ही नहीं उसको खुद कहते हैं

जिंदगी तुझसे हर एक सांस पर समझौता करूं शौक जीने का है मुझको मगर इतना तो नहीं

खामोशी की मौत गवारा नहीं मुझको 
शीशा हूं टूट कर भी खाना छोड़ जाऊंगा

हजूमे गम मेरी फितरत बदल नहीं सकते 
क्या करूं मुझे आदत है मुस्कुराने की

मिली हवाओं में उड़ने की वह सजा यारो 
कि मैं जमीन के रिश्तो से कट गया यारों

कभी-कभी यूँ भी हमने अपने जी को बहलाया है 
जिन बातों को खुद ना समझे औरों को समझाया है

हमको मालूम है जन्नत की हकीकत लेकिन दिल को खुश रखने को ग़ालिब ख्याल अच्छा है

दिल दे तो इस मिजाज का परवरदिगार दे 
जो गम की घड़ी को भी खुशी में गुजरते

न था कुछ तो खुदा था, कुछ न होता तो खुदा होता 
डुबोया मुझको होने ने, ना होता मैं तो क्या होता

जिंदगी क्या है खुद ही समझ जाओगे 
कि बारिशों में पतंग उड़ाया करो

अपने गम को किसी और को दिखाया न जाए घर पर ही बिखरी हुई चीजों को सजाया जाए

धूप में निकलो घटाओं में नहा कर देखो 
जिंदगी क्या है किताबों को हटाकर देखो

दिल भी जिद पे अदा है किसी बच्चे की तरह या तो सब कुछ ही चाहिए या कुछ भी नहीं

जब भी किसी से कोई गिला रखना 
सामने अपने आईना रखना

ऐ खुदा रेत के सेहारा को समंदर करते 
या छलकती हुई आंखों को भी पत्थर कर दे

चांद के साथ कई दर्द पुराने निकले 
कितने गम थे जो तेरे गम के बहाने निकले

क़हकहा आंखों का बर्ताव बदल देता है 
हंसने वाले तुझे आंसू नजर आए कैसे

सच घटे या बड़े तो सच ना रहे 
झूठ की तो कोई इंतहा ही नहीं

किन राहों से दूर है मंजिल कौन सा रास्ता है आसान 
हम जब थक कर रुक जाएंगे औरों को समझाएंगे

खुदा हमको ऐसी खुदाई न दे 
कि अपने सिवा कुछ दिखाई न दे

हर तरफ हर जगह बेशुमार आदमी 
फिर भी तन्हाइयों का शिकार आदमी

औरों को हंसते देखो मनु 
हँसो और सुख पाओ 
अपने सुख को विस्तृत कर लो 
सबको सुखी बनाओ

उन्हें यह ज़िद कि मुझे देख कर किसी को ना देख 
मेरा यह शौंक की सबसे कलम करता चलूँ

वह मेरे सामने गया और मैं 
रास्ते की तरह देखता रह गया

मेरा कातिल ही मेरा मुंसिफ है 
क्या मेरे हक में फैसला देगा

आखरी हिचकी तेरी बाहों में आए 
मौत भी मैं शायराना चाहता हूं

कारगर मेरी दुआ हो यह जरूरी तो नहीं,
मैं जो मांगू वह आता हो यह जरूरी तो नहीं. शेख करता तो है मस्जिद में खुद को सजदे, उसके दिल में भी खुदा हो यह जरूरी तो नहीं. खामोशी भी तो बाअंदाजे गिला होती है, शिकवा होठों से अदा हो यह जरूरी तो नहीं. इश्क ने साज ए मोहब्बत पर गजल छेड़ी है 
हुस्न भी नगमा ए सरा हो यह जरूरी तो नहीं. तीराबख्ती में भी जीने का मजा है मंजर, 
ऐश ही जुज्बे बका हो यह जरूरी तो नहीं.

तीराबख्ती- तकलीफ
जुज्बे बका- चिरस्थायी
नगमा ए सरा- संपूर्ण गीत

I do not love you, 
for
What you are
But for
What I am with you...

दो और दो का जोड़ हमेशा चार कहां होता है सोच समझ वालों को थोड़ी नादानी दे मौला

मेरी आवाज ही पर्दा है मेरे चेहरे का 
मैं हूं ख़ामोश जहां मुझको वहां से सुनिए

कोई हाथ भी ना मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से 
यह नए मिज़ाज का शहर है जरा मिला करो फासले से

कोई देता है दिल को मुसलसल आवाज; 
और फिर अपनी ही आवाज से घबराता है.
अपने बदले हुए अंदाज का एहसास नहीं; 
मेरे बहके हुए अंदाज से घबराता है.
राज को है किसी हमराज की मुद्दत से तलाश; और दिल है कि सोहबते हमराज से घबराता है. शौक यह की उड़े वह तो जमीन साथ उड़े; हौसला यह की परवाज से घबराता है.
तेरी तकदीर में आसाइश ए अंजाम नहीं; 
कि तू शोरिश ए आगाज़ से घबराता है.


ना मैं तलाश करूं 
तुम में 
जो नहीं हो तुम 
ना तुम तलाश करो मुझ में 
जो नहीं हूं मैं


यह बात उन दिनों की है 
जब इस ज़मी पर 
इबादत घरों की जरूरत नहीं थी 
मुझी में 
खुद था...!


और तो सब कुछ ठीक है
लेकिन कभी कभी यूँ ही
चलता फिरता शहर, अचानक
तन्हा लगता है...


फासला
चांद बना देता है 
हर पत्थर को 


शहर में सबको कहां मिलती है रोने की जगह अपनी इज्जत भी यहां हँसने हँसाने से रही


मोहब्बत में नहीं है फ़र्क जीने और मरने का
उसी को देखकर जीते हैं जिस काफिर पे दम निकले


हर आदमी में होते हैं दस बीस आदमी
जिसको भी देखना हो कई कई बार देखना


एक पल में हम वहां से उठे 
जहां बैठने में हमें जमाने लगे


अच्छा है दिल के पासवाने रहे अक्ल 
पर कभी-कभी इस तनहा भी छोड़िए

He who wins 
most of the arguments 
has fewest friends

Man is not only responsible for what he does; he is also responsible for what happens to him...
(Lala ji & Daddy)


He who is afraid to ask is ashamed of learning.


Our five senses are incomplete without the sixth one...
'Common Sense'


A Smile is a curve 
which can put 
lot of things 
Straight !


ख़ामोशी भी बा- अंदाज- ए गिला होती है
जरूरी तो नहीं शिकवा होठों से अता हो


We are not chemicle 
We are human
We can think
Before Reaction


क्यूं डरे 
जिन्दगी में 
क्या होगा
कुछ 
ना होगा 
तो 
तजुर्बा होगा


मैं हर रात सारी ख्वाहिशों को 
खुद से पहले सुला देता हूँ.

हैरत ये है कि हर सुबह
ये मुझसे पहले जाग जाती हैं.

Friday, February 20, 2026

ग्रामोफोन रिकार्ड

ओशो की किसी किताब में पढ़ा था.

मैं तुम्हें तुम्हारा पता नहीं दे सकता
मुझे मेरा पता है 
और कैसे मुझे मेरा पता लगा 
इसकी विधि जरूर तुमसे कह सकता हूं 
कैसे मैने खोदा अपना कुआं 
कैसे पाया अपना जल स्रोत 
उसकी विधि तुमसे कह सकता हूं 
उस विधि को भी जड़ता से मत पकड़ लेना 
नहीं तो चूक हो जाएगी 
यह मामला नाजुक है 
नाजुक इसलिए है कि 
दो व्यक्ति एक जैसे नहीं होते 
दो व्यक्तियों के भीतर का 
नक्शा भी एक जैसा नहीं होता 
लेकिन इशारों को तुम 
नक्शे मत मान लेना 
इस दुनिया में कोई नक्शा नहीं है 
आत्मज्ञान का 
हाँ बहुत लोगों ने- 
बुद्धों ने- इंगित किए हैं
इंगित का अर्थ ही 
यह होता है कि समझो 
फिर समझ पूर्वक 
अपने अनुकूल डालो 
प्रत्येक व्यक्ति को 
अपने धर्म की तलाश करनी होती है 
और जो लोग मानकर बैठ जाते हैं- 
हिंदू मुस्लिम जैन इसाई
वे चूक जाते हैं
वे सोचते हैं कि मिल गई बाइबल 
मिल गया कुरान मिल गए वेद 
अब और क्या करना है 
इनको कंठस्थित 
करें ग्रामोफोन रिकॉर्ड हो जाओगे 
रटंते तोते बन जाओगे
खुद का पता ना मिलेगा...

Friday, April 29, 2022

बुद्धत्व

बुद्धत्व क्या है
किसी का मन, वचन और कर्म से...
सरल
सहज
सजग
हो जाना.

Friday, November 12, 2021

सृष्टि

सृष्टि 
एक चक्र है 
जहां शुरु 
वहीं खत्म है,
और
जहाँ खत्म 
वही शुरू...

Tuesday, May 18, 2021

JAWAHAR 18 JANUARY

दोस्तों में से एक दोस्त की फिजिकल प्रेजेंस कम हो गई। virtually तो वह कभी अलग हो ही नहीं सकता।
19 जनवरी 2020 संडे सुबह काम पर जाने के लिए तैयार हो रहा था। एक टांग पेंट में और दूसरी अंदर जाने की तैयारी में थी, कि फोन घन घना उठा. नजर पड़ी तो कपिल का था. अक्सर इतनी सुबह हम दोस्तों को एक-दूसरे को फोन करने की आदत नहीं है. निशाचर जो ठहरे. आधा अंदर और आधा बाहर वाली स्थिति में ही मोबाइल उठाया.
" मेहता,जवाहर नहीं रहा." कुछ मिनट्स का pause... दूसरी टांग पर ठंड अब ज्यादा महसूस होने लगी थी। पर हाथ थे कि चल ही नहीं रहे थे। यह कुछ चंद लम्हे कई सालों जैसे लंबे महसूस हो रहे थे।
"राजीव का फोन आया था।"
उसने बोला।
कपिल की आवाज किसी रोबोट जैसी संवेदनहीन लग रही थी। यतेंद्र को फोन किया तो उसकी शुरुआत हुई भैनचौ... कोई दोस्त ही ऐसा रिएक्शन दे सकता है। हरीश हमेशा की तरह हम सबसे ज्यादा संयत था। पॉल द ग्रेट हर्ट थे और मणिपुर से अपनी भावना इजहार कर रहे थे।
मुनीश से कोई संपर्क नहीं हो पा रहा था और लवलीन बिल्कुल ब्लैंक थी।
लगातार अपने अपने स्त्रोतों को खंगाला जा रहा था, जो लंदन से हमें सही सिचुएशन बता सके। ऑफिस जाने का मन और हिम्मत दोनों ही नहीं थे। हम सब cricess of recation से गुजर रहे थे। क्या react करें कैसे react करें कुछ समझ ही नहीं आ रहा था। कोई गालियां दे रहा था, कोई हंस रहा था, कोई बिल्कुल सदमे में था, कोई बिलकुल  चुप तो कोई बहुत बड़बड़ा रहा था। कभी ऐसा भी होगा सोचा ही ना था।
एक दूसरे को दिन भर फोन इसलिए नहीं होते रहे कि कोई जरूरत थी, बल्कि एक दूसरे से बात करके ही हम खुद को समझाने की कोशिश कर रहे थे। दीपा (जवाहर की बहन) से बात करने की हिम्मत ही नहीं हो पा रही थी। राधाकृष्णन,अमिताभ, हिमांशु, प्रियंका इत्यादि इत्यादि सभी से अचानक ही कई सालों के बाद मैसेजिंग चालू हो गई... कड़ी जवाहर ही था।
फेसबुक अपडेट देखकर ऐसे कई फोन आने चालू हुए जिनको मैं जानता ही नहीं था, वह जवाहर के schoolmates या ऑफिस कलीग थे। यह जवाहर का व्यक्तित्व ही था कि जो उससे मिला, हमेशा के लिए उसी का हो गया। हम दोस्तों के बीच का अटल बिहारी यानी आजाद शत्रु था।

ग्रेजुएशन फर्स्ट ईयर की बात है- शायद फर्स्ट क्वार्टर की,

हम दोनों डीटीसी की U SPECIAL में थे मैंने पूछा यार कोर्स कैसा चल रहा है? तपाक से जवाब आया कि मैंने तो SYLLABUS पूरा भी कर लिया। एक गजब का CONFIDANCE था साले मे।
और वाकई जवाहर तूने लाइफ का सिलेबस सबसे पहले पूरा किया।
Kasturi Rangan Jawahar
K R Jawahar
02/10/1975 to 18/01/2020

Friday, January 15, 2021

ओस की बूँद

कह देना समन्दर से 
हम ओस के मोती हैं 
दरिया की तरह 
तुमसे मिलने नहीं आएंगे...!

ओस की बूंद से 
बोला समन्दर,

भाप बन जाओगे, 
फिर बरस कर 
मुझ तक ही आओगे।

Wednesday, December 9, 2020

दांव

कभी यूं भी आजमाओ नसीब को अपने 
कि दांव पर लगे हो नकाब सब अपने.

Sunday, September 27, 2020

आदमी

बड़ी अजीब 
कौम
है 
ये।
जानवर बोलो 
तो 
नाराज, 
शेर बोलो 
तो 
लाजवाब 
है
ये।

Wednesday, September 16, 2020

माफी चाहता हूं

आज हिंदी दिवस है. व्हाट्सएप और फेसबुक संदेशों से लबालब भरे हुए हैं.
हिंदी पर लोगों का गर्व आज उमड़ घुमड़ कर मर मिटने को तैयार है.
कभी-कभी लगता है कि हम लोग गर्व की जगह अभिमान की अभिव्यक्ति करते हैं.
गर्व का आधार ज्ञान है.अभिमान का तो कोई आधार ही नहीं है. वह तो हवा पर तशरीफ़ फरमाता है. ज्यादा हवा से चलती गाड़ी और उसमें सवार जिंदगी को,कम हवा की बनिस्पत ज्यादा खतरा है. तो आइए लगे हाथ कुछ हवा कम करते हैं और अभिमान को गर्व तक सीमित करते हैं.
फारसी,उर्दू और अंग्रेजी के बाद हिंदी शासकीय भाषा बनी. शासन बदला भाषा बदली अतः गर्व भाषा का नहीं शासन से संबंधित था.
आज छोटे-छोटे बच्चे जो शानदार हिंदी के वाक्यों को को बोलकर मां बाप को चकित कर रहे हैं ना, उसका श्रेय आप की सरकारों और हिन्दी लेखको को नहीं बल्कि पसंदीदा कार्टूंस को बेहतरीन आम बोलचाल की भाषा में डब करने को जाता है.
थलाइवा,अन्ना,तंबी, वानक्कम इत्यादि से हिंदी भाषी लोगों की जो हेलो हेलो हुई है ना, उसका श्रेय साहित्य में हीन दर्जे पर माने जाने वाली हिंदी व्यवसायिक फिल्मों को जाता है.
बाल्मीकि रामायण का पहला अनुवाद हिंदी में नहीं हुआ था. यह असमि मे माधव कांदिली रामायण थी. इसकी रचना 14वी शताब्दी में हुई थी. तुलसीदास की रामचरितमानस कई शताब्दियों बात लिखी गई थी.
भाषा को सरल, सहज, सुलभ बनने दें. सर्वग्रही बने, कुएं के मेंढक नहीं. गर्व तक तो ठीक है, मगर उन्माद नहीं. भाषा को थोपिए नहीं पानी जैसे बहने दीजिए, रास्ता खुद-ब-खुद बनता चला जाएगा. 
अपनत्व का भाव दीजिए सारी देसी भाषाएं हमारी अपनी हैं. दक्षिण,पश्चिम और पूर्वी भाषाओं का साहित्य सर्जन कहीं भी हिंदी से कम नहीं है. पंजाबी भाषा सूफी साहित्य की खान है.
दिल दुखा हो तो माफी चाहता हूं.

Monday, June 22, 2020

आईना

हर आईना 
सच्चाई नहीं 
दिखाता,
कुछ आईने 
मेले मे 
बच्चों को
लोटपोट 
करने 
के लिये
भी
होते है।।
कुछ 
रुपयों की 
टिकट 
होती है
इन पर...
कहीं मोटा
कहीं पतला
तो
कहीं पिल-पिला
सा दिखता है
अक्स...
खूब 
हंसता था 
बचपन में 
देख कर 
इनको।
नेता नगरी
के कुछ 
नेता भी
ऐसे ही
अक्स 
दिखा 
रहे है
खुद को
सच्चाई का
आईना 
कह
फ्री मे
जनता को
लोट-पोट
किए
जा
रहे है।
हर आईना सच्चाई नहीं दिखाता 
हर आइना सही अक्स नहीं दिखाता।।

Saturday, May 30, 2020

18 नवंबर

18 नवंबर 2010 दोपहर,ऑपरेशन थिएटर में एफएम चल रहा था. डॉ मालविका,डॉक्टर शिवानी, उनकी 2 असिस्टेंट,एक एनेस्थेटिक के अलावा टेबल पर मीतू और साथ में स्टूल पर में था।
मीतू के पेट में चीरा लगा कर डॉक्टर ने कुछ मांस की परतें और खोली। स्टील के अर्धचंद्राकार इक्विपमेंट को उस कट में फिट किया गया।

एक पानी से फूले हुए गुब्बारे नुमा थैली जो बाहर की तरफ निकल रही थी उसको चीरा लगाया...और चारों तरफ उस LIQID की छींटे उछल गई।
एक बड़े चम्मच नुमा(service spoon जैसा) उपकरण को cut के अंदर डाल कर कुछ खींचा जा रहा था... हल्के बालों सहित यह तुम्हारा सिर था जो मुझको सबसे पहले दिखा था।धीरे से तुम को बाहर निकाला तो सबसे पहले यह तुम्हारे रोने की आवाज थी जो मैने और मीतू ने सुनी थी। मीतू और तुम्हारे बीच जो अंबिलिकल कॉर्ड थी उसको काट कर तुमको अलग किया गया।
Umbilical cord से स्टेम सेल को अलग करके सुरक्षित रखने वाली कंपनी के नुमाइंदे के हाथ पूरी व्यवसायिक तेजी से चल रहे थे।

खून का लाल रंग सब तरफ था। डॉक्टर के हाथ पर टेबल पर जमीन पर, मगर पहली बार फैला हुआ खून भी सकून दे रहा था।

नर्स तुमको अपने हाथों में उठा कर साफ़ करने के लिए जाने लगी...अचानक मुङी और तुमको मेरे पास ले आई यह मैंने और मीतू ने तुम को पहली बार देखा था।

" मां-बाप,दादा-दादी,चाचू-चाची, नाना-नानी,मामा-मामी बुआ-फूफा सब एक झटके में पैदा हो गए थे।"

कहते हैं आज तुम्हारा जन्मदिन है।मुझको तो इन सब रिश्तो का जन्मदिन लगता है। प्रभु तुम्हें ऐसी प्रज्ञा से नवाजे कि तुम हमेशा रिश्तो की गर्माहट का आनंद लेते रहो स्वस्थ रहो मुस्कुराते रहो।

14 जुलाई

दादी का देहांत हुए लगभग 5 साल होने वाले हैं. उनके इंतकाल यानी 14 जुलाई से एक हफ्ता पहले हॉस्पिटल प्रवास के दौरान दादी के साथ कई यादें जुड़ी हुई है.

वीर उनकी चौथी पीढ़ी था. वीर के जन्म पर दादा-दादी (जिनको हम सब पापा जी भाबी जी कहते थे) के चेहरे के भाव उनके उल्लास को बयान कर रहे थे. साथ ही साथ अपने बड़े बेटे (यानी डैडी) को खो चुकने का दर्द भी कहीं ना कहीं छलक उठता था.

90-92 की उम्र में भी वीर के साथ पापा जी का दरवाजे के पीछे से लुका छुपी खेलना...अलग अलग तरह से आवाजें निकालकर, उसकी मुस्कुराहट देखकर लाजवाब हो जाना...
भाभी जी के बिस्तर पर चढ़कर उनको टांगे मारना, बिस्तर खराब कर देना... इन पर भी भाव-विभोर होना.
इन सबका मैं साक्षी हो पाया यह मेरा सौभाग्य ही तो था.

खैर फिर वापस हॉस्पिटल पर आते हैं.

रूम से आईसीयू,आईसीयू से रूम फिर आईसीयू इन सबके बीच की अदला बदली के बावजूद,दादी कभी भी नहीं भूली थी कि वीर के मुंडन उन्होंने 14 जुलाई के लिए तय किए हैं.
परिवार से जो भी मिलने आता,उसे यही याद करवाते कि मुंडन 14 जुलाई को ही होने हैं.
मुण्डन बाद मे करवाने के मेरे प्रस्ताव को उनके इसरार भरे उत्तर ने खारिज कर दिया था.

पास बैठी नीतू आंटी और सीता आंटी को उन्होंने बुलाया, मुंडन के सारे रीति-रिवाज समझाएं और पूरा करने की जिम्मेदारी दी.

"हलवा बनाकर थाली में रखना. उसको बकरे का आकार देना.और फिर उसे कृपान से काटना."
सलाम है मेरे पुरखों को जिन्होंने बलि देने के रिवाज में तब्दीली लाते हुए उसको हलवे के बकरे में बदला.

12 या 13 जुलाई को पाबी जी ने रिस्पांस देना बंद कर दिया था. मैंने पवन अंकल,मम्मी और मीतू ने निर्णय लिया कि मुंडन भाभी जी की इच्छा के मुताबिक ही होंगे.

14 जुलाई सुबह सुबह नाई को उस्तरा चमकाने का मौका दिया गया.सारी रस्में पूरी की गई. जैसे ही नाई अंतिम उस्तरा उतारकर अलग हुआ...फोन घन घना उठा नरेश अंकल फोन पर थे. भाबी जी ने बस अभी अंतिम सांस ली है. मैं इस कहानी, इस अनुभव को कंनक्लूड नहीं कर पाया और ना ही कर पाऊंगा.
शायद मैं चाहता ही यही हूं कि कोई निष्कर्ष ना निकाला जाए. सिर्फ भावनाएं और संवेदनाएं ही रहे.

बजरंग बली 2

शेरवानी, लंहगे,साड़ी से सजी मैनिक्विन और सामने बजरंगबली... क्या तालमेल है??
बाल ब्रह्मचारी घिरे है बाजार से. शादियों का सीजन है. चारों तरफ चूड़ा, चुन्नी, लहंगा, शेरवानी और ज्वेलरी की धूम है.
सड़क पर भरपूर चहल पहल है. मंदा सा कुछ चल रहा है... अखबार ऐसा कहती हैं. शोरूम अपेक्षाकृत कुछ कम भरे से हैं. खाने के स्टॉल और फुटपाथ बाजार में पूरी रौनक है.
भीड़ में लड़के लड़कियों की डेटिंग करते हुए जोड़े, टिंडर पर डेट ढूंढते हुए छड़े, चह-चाहते लड़कियों के ग्रुप, शादी की खरीदारी करते परिवार, ज्वेलरी शोरूम की साड़ी पहनी पुती- पुताई सेल्सगर्लस... तरह-तरह की भीड़ है.
मंदिर के आगे से निकलते हुए कोई दिल पर हाथ रखकर झुकते हुए, कोई हाथ जोड़कर निकलते हुए, कोई रुक कर घंटी बजाकर बुद-बुदाते हुए, वाकई में वैरायटी है : दुआ मांगने वालों की और दुआ मांगने के तरीकों की.
द्वार के ठीक ऊपर रक्षक बजरंगबली तो है ही. मंदिर में ठीक सामने मंद-मंद मुस्कुराते हुए राधा-कृष्ण की मनमोहक मूर्ति है.
हरे वस्त्रों में राधा और पीतांबर में सोलह कला संपूर्ण कृष्ण.

आइए अब जरा क्लाइडोस्कोप मैं झांकते है...

बजरंगबली आपका नाम लेकर यह जो दल बना है ना लड़के लड़कियों के जोड़ों को हड़का रहा था.
कह रहा था कि "सभ्यता खतरे में है."
हे बाल ब्रह्मचारी आप तो राधा कृष्ण की मूर्ति के रखवाले हैं, द्वार पालक हैं. क्या आपको भी धमकाया इन्होंने??
आपको भी चिल्ला कर बोल कि हे बॉडीगार्ड हट सामने से.राधा की मूर्ति हटानी है रुक्मणी की लगानी है.

बजरंगबली

आजकल मेट्रो से आना जाना हो रहा है. पार्किंग वगैरा की झंझट से मुक्ति. मेन मार्केट से गुजरते हुए बड़े मजेदार अनुभव हो रहे हैं. अक्सर वापसी शाम 7:30 के आसपास होती है. मार्केट में ही मंदिर है और वहां संध्या आरती की आवाज अक्सर सुनने को मिलती है.
ओम जय जगदीश हरे... मंदिर छोटा सा है.बाहर लिखा है 1948 में स्थापित. मुख्य द्वार के ठीक ऊपर चिर परिचित अंदाज में हनुमान जी उर्फ वीर बजरंगी उर्फ बाल ब्रह्मचारी अपनी लंगोट में, हाथ में गदा धारण किए हुए विराजमान हैं.
जीवन भी बड़ा मजेदार है. एकाकी रूप में देखने में चीजें अलग भाव देती हैं. और जब उनको एक दूसरे के साथ रखकर देखा जाता है तो क्लाईडोस्कोप बन जाता है. ब्लैक एंड व्हाइट चित्र रंगीन हो जाता है. ऐसा ही कुछ हमारे बाल ब्रह्मचारी हनुमान जी की मूर्ति के साथ है.
मंदिर के ठीक सामने कई दुकानें हैं और स्वाभाविक रूप में महिला ग्राहकों का विशेष ध्यान है
झीने-झीने कपड़ों में लिपटे बुत आकर्षित करते हैं. ऊपर वाला तो सभी बलाओ को अलग-अलग बनावट देता है.परंतु ये बुत तो आदमी की कल्पना में परफेक्ट फिगर का रूपांतरण है.लाइन से काले/ गोरे/स्टील फ्रेम के बुत और उन पर झीने-झीने कपड़ों के आवरण चाहते और न चाहते हुए भी कुछ नहीं छुपा पाते.
बगल वाली दुकान की विंडो तो भावनाओं का ज्वार पैदा करने के लिए ही शायद खुली है. विंडो में बुतों के ऊपर बेहतरीन अंतः वस्त्र (आजकल के लफ्जो में लॉन्जरी) आपको कल्पनाओं में ले जाने के लिए काफी है.
आज इन बुतों पर पिंक कलर कहर ढा रहा था. कल काले रंग का जलवा था. उससे पहले फिरोजी और पहले सब लाल ही लाल था. अब तो शाम को जाते हुए मन में कौतूहल होता है कि आज कौन सा रंग या कौन सा ढंग होगा?
बेचारे बाल ब्रह्मचारी की मूर्ति ठीक इन नुमाइशई बुतो के सामने हैं. आंखें भी ठीक इधर ही लगती है. वे है भी मंदिर के द्वार के ऊपर तो ज्योमेट्री के मुताबिक आदर्श कोण पर स्थापित है.
रोज बदलते रंग ढंग और एक टक स्थापित बजरंगी की निगाहें, मन को रोज गुदगुदाती है.जहन में शरारती विचारों को पैदा करती हैं. अब तुम्हारा क्या होगा बजरंगबली?यह तो कलयुग है.
मगर बजरंगबली हैं कि स्थिर है, स्थापित हैं, बुत हैं और बुतों की और ही देख रहे हैं. दोनों ही बुतों में जीवन हमारी भावनाएं ही दे रही हैं.

हिंदू या सिख

एकीकृत पंजाब के गुज़रावाला मे है मेरे परिवार की जड़े।
परदादा लाला मथुरादास मेहता ने अपने सबसे बडे बेटे(यानि मेरे दादा)को सिख बनाया, नाम दिया सरदार स्वरूप सिंह मेहता। बाकी तीनो छोटे भाई सहजधारी रहे।दादी का नाम था सरदारनी राजेन्द्र कौर मेहता।
क्या यह एक परिवार था, या कुछ हिन्दू और कुछ सिख थे ?
1947 मे विभाजन हुआ, दंगे हुए।
गैर मुसलमान होने की वज़ह से लुटे भी, पिटे भी, जान के लाले भी पड़े।
500 एकड़ भूमि पर कृषि करने वाला परिवार शरणार्थी बना।
जाने कैसे जा पहुंचा यह परिवार भिण्ड(मध्यप्रदेश)।
शून्य से मेहनत की और फिर परिवार सम्पन्न हुआ।
अब बारी थी 1984 की, फिर बारी थी दंगो की, लूट की,मारने की, जलाने की...फिर से शरणार्थी होने की। किस्मत अच्छी थी जान बची।
आखिर मेरी पहचान क्या है?
हिन्दू या सिख ?
मै तो कोई अन्तर ही नही कर पाता।
बचपन से घर मे ओम जय जगदीश हरे.... और सतनाम करता पुरख....दोनो का रस लिया है।
पंजाब मे एक हिन्दू नेता की हत्या की खबर ने मेरे ज़ख्म फिर हरे कर दिए है।
दादा जी यानि सरदार स्वरूप सिंह मेहता सिर्फ़ उर्दु ही पड़ पाते थे(सुखमनी साहिब व अन्य गुटके भी उर्दू के ही पड़ते थे)और दादी सिर्फ गुरमुखी। ऊपर से मेरी माँ यानि सरदारनी दादी की कृष्ण भक्त बहू। मगर घर मे तो कभी दंगे नही हुए। न भाषा पर ना धर्म पर।

जरूरत या आदत

जरूरत का ही परिष्कृत नाम है अर्थव्यवस्था, यानी economy

अब आपके मन में चल रहा है कि क्या बोल रहा है यह गधा ?
इसको ना GDP का पता ना CRR का क्या जाने ECONOMY का ?

चलिए कुछ *गंदी बात* करते हैं (एकता कपूर वाली नही)

गंदी से मेरा कहने का मतलब है गैर-परिष्कृत.

जो लोग कस्बों में पैदा हुए हैं उनको पता होगा कि लगभग 20-25 साल पहले लोग वॉशरूम नहीं जाते थे,टट्टी जाते थे. फिर लैट्रिन जाना शुरू हुए कुछ अरसा पहले वॉशरूम या रेस्ट रूम, और अब WC.दोस्तों शब्द तो परिष्कृत होते गए क्या मूल मुद्दा या ITEM भी बदला ??

बिल्कुल यही अंतर है जरूरत और इकोनॉमिक्स का. आडंबर बढ़ते गए पेड़ के पत्ते से पानी और लोटे से जेट पंप हैंड शावर और टॉयलेट पेपर तक, सब बदलते गए. याद रखिए मूल मुद्दा वही था साफ करना.

याद है??
सबने पढा था बार्टर सिस्टम.
भाई मेरे पास गेहूं है पर सब्जी नहीं तू सब्जी दे दे, मैं गेहूं देता हूं. मै नाई हूं तू बढई. मै बाल काट दिया करूगा तू मेरा लकड़ी का काम कर दिया कर.
एक दूसरे की जरूरत पूरी करने की व्यवस्था.
धीरे-धीरे उत्पादन बढ़ा और यहीं से आना शुरू हुआ अंतर. बड़े हुऐ उत्पादन को संग्रह करने की जरूरत ने भंडार गृह पैदा किए, और यही से समानता ने असमानता की तरफ बढ़ना चालू किया होगा.
आदान-प्रदान से व्यवस्था बदल कर आनाज से भुगतान की तरफ पर चली थी. समाज पत्ते से पानी यानी लोटे की तरफ चल पड़ा था.

मुद्रा के प्रचलन में आने के बाद एक नया वर्ग पैदा हुआ व्यापारी. इसने संग्रह किया हुआ माल खरीदा और जहां इस सामान की कमी होती थी वहां नफा लेकर बेचा. अब राज्य भी संगठित होना शुरू हो गया था. उसको भी मुद्रा का चस्का लग चुका था. राज्य की सम्पन्नता और नगर सेठों की संख्या बढ़नी शुरू हो गई थी. लोटे में केवड़ा और गुलाब अर्क डालना शुरू हो गया था यहीं से लोटे और लोटे में अंतर आना भी शुरू हो गया था. अब संपन्नता को सुरक्षा की जरूरत थी.ज्क्हिए थी जीवन की आग से पानी से जानवरों से परंतु अब सुरक्षा की दरकार थी असमानता से. राज्य को अपनी संपत्ति, एशो आराम, अय्याशी को सुरक्षित रखने की जरूरत थी.
अब अर्थव्यवस्था उत्पादन आधारित से आगे बढ़ गई थी. यह अब खपत Consumption आधारित हो चुकी थी. 
व्यापारिक घरानों के पास सामान था गोदाम भरे हुए थे बेचना जरूरी हो गया था. तो अब उधार ले लो की शुरुआत हुई. ब्याज की शुरुआत हुई. समान की जगह मुद्रा/पैसा बिकना शुरू हुआ. अब यह व्यवस्था खपत consumption से वित्त finance आधारित हो चली थी. इसके key words थे loan, insurance, shares, डिवेंचर, banking. *जरूरत अब COMMODITY बन चुकी थी.* सब डिजिटलाइज हो रहा था. दसवीं मंजिल पर w.c. में बैठा आदमी लौटे की जगह जेट पंप, toilet paper या हैंड शावर इस्तेमाल कर रहा था. अचानक प्रकृति की गोद से कोरोना नामक विषाणु निकला और लोगों को घरों में बंद कर दिया. खपत कम हो गई,यह अर्थव्यवस्था वापस जरूरत के सामान पर आ गई. टॉयलेट पेपर की लूट हो रही थी. टॉयलेट पेपर की कमी थी मगर, जरूरत टॉयलेट पेपर की नहीं सफाई की थी. टॉयलेट पेपर की तो सिर्फ आदत थी.
आज की ये अर्थव्यवस्था, जरूरत की नहीं, आदत की अर्थव्यवस्था है...

VIR

VIR
तू भी जानता है कि मैं कितना प्यार करता हूं और मैं भी जानता हूं. जताने की जरूरत है क्या ?
मेरा गुस्सा मेरी डांट तेरे लिए मेरे प्यार का हिस्सा ही तो है. कच्ची मिट्टी, यह फटकार तेरे को गूंथने के लिए ही तो है तुझे सही आकार मिले यही चाहत है.

पिता के साथ एक थोड़ा फासला सा हुआ करता था. मां एक पुल हुआ करती थी. आज जितना कम्युनिकेशन नहीं हुआ करता था. हर नए दिन आई लव यू डैड या आई लव यू बेटा कहने का प्रचलन भी नहीं था. मगर यह एहसास हमेशा था कि मेरे पिता हमेशा मेरे साथ हैं.
आवाज ऊंची होते ही पेंट गीली होने की नौबत तक आ जाती थी. मगर आप हमेशा आदर्श थे.

शेव बनाते हुए ब्रश से फोम लगा देना..

साइकिल के अगले डंडे पर बैठाकर चलाते हुए गड्ढे पर बिल्कुल धीरे से निकालते हुए कहना कि लगी तो नहीं...

रात को सोते हुए माथे पर आपकी गरम हथेली का एहसास...

आज वीर की डांट लगाई है. डांट लगाने के बाद डैडी आपकी बहुत याद आई. आप कहते थे ना जब बाप बनेगा तब पता चलेगा...